महर्षि सौभरि जी की परंपरा से प्रतीत होता है कि आप सृष्टि के आदि से महामान्य महर्षियों में थे । ऋग्वेद की विनियोग परंपरा का आर्षानुक्रमणी के अनुसार ब्रम्हा से अंगीरा, अंगेरा से घोर, घोर से कण्व और कण्व से महर्षि सौभरि होते है । इस प्रकार ये बहुऋयाचार्य महामहीम, मंत्र द्रष्टा एवम ब्रह्म जी के पंति हो जाते हैं । वैसे तो सभी ऋषीगण परम तपस्वी थे । सबकी जीवनियाँ नितांत तपोवन है फिर भी भार्गव और अंगीरस इन 2 वंशो को परम तपस्वियों के रूप में वेद में निर्देश किया है । वेद "भृगु और अंगिरा के तप में तप जाओ " यह कहकर तपाने की आज्ञा देता है वेद मैं इन दोनों के नामों का ही निर्देश है । इससे साफ पता चलता है कि वेद सब में इन 2 वंशो को अधिक तपस्वी मानता है । और ये तप के बारे में अग्रणी रहे भी । महर्षि सौभरि जी इन तपस्वियों में अग्रणीय है । महर्षि अपने अभिवाद से लेकर चक्रवर्ती के समय तक यमुना जी की तपोमय भूमि में यमुना के पानी के भीतर समाधि लगाकर 10 युग तक ध्यान मग्न रहे । वृंदावन में आज का कालीदह ही महर्षि सौभरि जी का तपोस्थली था । भागवत 10 स्कंध के 17 वे अध्याय में लिखा है कि एक दिन विष्णु भगवान के वाहन गरुड़ ने वहाँ आकर यमुना मैं एक बड़े मत्स्य का आखेट किया । सभी मीन इस घटना से दुखी हो गए । महर्षि वाल्मीकि के समान सौभरि महर्षि का ह्रदय भी करुणा से भर गया । और अचानक उनके मुख से यह वाक्य निकल पड़े कि भले ही गरुड़ विष्णु का वाहन है, यदि अब वह वृंदावन की सीमा में घुसकर मत्स्य भक्षण करेगा तो वह तुरंत ही मृत्यु को प्राप्त होगा ।

महर्षि सौभरि जी का यह मत्स्य एवं समस्त जलचरों पर भारी अनुग्रह था । यही श्राप गरुड़ विरोधी तत्वो के लिए आशीर्वाद सिद्ध हुआ । रमणक द्वीप का निवासी कालिया नाग भी बलि के विरुद्ध गरुड़ से लड़ा था । महाशक्ति शाली होते हुए भी वह अपनी पराजय देखकर सौभरि जी के आश्रम में उनकी शरण में आ गया । इस श्राप के बारे में केवल कालिय नाग ही जानता था । उसे यह मालूम था कि गरुड़ सौभरि आश्रम के आस पास नहीं आ सकता । कालिया नाग के सौभरि जी के आश्रम पर आने से तथा सैकड़ों वर्ष वहां रहने के कारण यह क्षेत्र अहिवास के नाम से प्रसिद्ध हो गया । संस्कृत भाषा में नाग को "अहि" कहकर संबोधित किया है । उस समय की आम भाषा की संस्कृत थी । कालिय के साथ उसका पूरा परिवार भी यहां आकर बस गया था । परिवार भी अलौकिक था । यह अलौकिक नाग "अहि" परिवार सैकड़ों वर्ष तक महर्षि आश्रम में या उनके द्वारा शापित क्षेत्र की सीमा में रहा । सौभरि जी का उसे पूर्ण संरक्षण था । सौभरि जी ने कालिय को शरण दी थी । ऋषि के आश्रम के आसपास का सारा क्षेत्र "अहिवास" के नाम से प्रसिद्ध हो गया ।
रमणक द्वीप पर नागो का साम्राज्य था । विष्णु भगवान का वाहन गरुड़ वहां जाकर प्रतिदिन नागो का भक्षण करता था । तथा कुछ को वह परेशान करता था । इससे व्यथित होकर नागो ने अपने बुजुर्ग अनुभवी नाग वासुकी को ब्रह्मा जी के पास इस विनाश का उपाय जाने के लिए भेजा । ब्रह्मा जी ने वासुकी नाग को बताया कि नाग संहार से बचने के लिए प्रतिदिन एक नाग एक निश्चित स्थान पर बलि के लिए गरुड़ को उपलब्ध करा दिया करे । इससे गरुड़ अपना तांडव बंद कर देगा । कुछ दिन यह सिलसिला चला । एक दिन कालिय नामक नाग ने इसका विरोध किया तथा इस प्रथा को बंद करा दिया । जब गरुड़ को यह मालूम हुआ कि इस प्रथा को बंद करने में कालिय नाग का हाथ है तो उसने कालिय नाग को मारने के लिए उस पर हमला कर दिया । कालिय ने अपने बचाव में कई प्रयत्न किये लेकिन गरुड़ की आक्रूत ताकत के सामने है वह नतमस्तक सा हो गया । कालिय नाग को ही यह बात मालूम थी कि वृंदावन में महर्षि सौभरि के आश्रम की वुहद सीमा में गरुड़ का प्रवेश प्रतिबंधित है । महर्षि सौभरि जी के श्राप के कारण यह स्थान गरुड़ के यहां प्रवेश करने के लिए प्रतिबंधित हुआ था । अतः कालिय नाग अपनी जान बचाने के लिए महर्षि सौभरि आश्रम के पास आकर बस गया । उसके साथ उसका अलौकिक परिवार भी था । इस श्राप के कारण कालिय नाग को जीवनदान मिला था । ऋषि ने एक परम वैष्णव को श्राप दिया इसलिए ऋषि का पतन हुआ । उसकी तपस्या में विक्षेप आया और उन्हें गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना पड़ा । स्वामी जी के इस कथन से बहुत भक्तजन समस्त नहीं हो सकते हैं । सौभरि जी को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करना पड़ा । इस विषय पर भागवत में कुछ अलग कहती है ।