कल्याण देव जी एक सात्विक प्रवृत्ति के ब्राह्मण थे । पिछले तीन जन्मों से ये बलराम दाऊजी की भक्ति करते थे । उनकी उपासना करते थे । श्री बलराम दाऊजी के कल्याण देव जी को यह वरदान दिया था कि अगले जन्म में भी मैं आपकी सेवाएं स्वीकार करूंगा । आपके परिवार के मध्य, उनकी भावनाओं के अनुरूप आर्यावतार के रूप में रहूंगा । श्री कल्याण देव जी की दाऊजी के प्रति यही भक्ति उनकी वैश्विक संपत्ति थी । इनका जन्म संवत् 1595 में ब्रजमंडल में श्री गिरिराज जी के तलहटी में बसे गांव कुंजवाटिका में पंडित अभयराम जी के घर हुआ था । पिता एक बहुत साधारण किसान थे । कल्याण देव जी के परदादा पंडित पृथ्वीराज शर्मा मूल रूप से राजस्थान स्थित तगारा गांव के निवासी थे । इस तगारा गांव में महर्षि सौभरि जी की आठवी पत्नी तगन्या का महल था । तगारा गांव तगन्या का नाम का ही अपभ्रंश रूप है । पंडित पृथ्वीराज शर्मा सौभरि जी की पत्नी तगन्या के वंशज थे । एक बार यह गांव प्लेग की चपेट में आ गया था । पूरा गांव खाली हो गया । सभी गांववासी जिसे जहाँ स्थान मिला वहाँ समायोजित हो गये । इस भयंकर काल श्रंखला से बचने हेतु पंडित पुर्थ्वीराज शर्मा ब्रजमंडल के कुंजवाटिका गांव में आकर बस गये थे । चूकि यह गांव पहले से ही सौभरेय ब्राह्मण का था । तगारा गांव से यहा आकर बसने वाले लोग अपनी अलग अलग पहचान के लिए अपने गांव का नाम भी लिखते थे । इसलिए ये तगारे कहलाने लगे । आज यह तगारे शब्द इनका गोत्र जैसा हो गया है । वैसे इनका मूल गोत्र तो अंगीरस है । कुंजवाटिका गांव श्री कृष्ण कालीन गांव है । इस गांव का सूरज मंदिर और सूरज कुंड इसकी ऐतिहासिकता के प्रमाण है ।

सूरज कुंड करीब 20 एकड़ में था । यह एक पाताल तोड़ कुंड है । उस समय ब्रज तथा आसपास के क्षेत्रों के इस प्रकार के 12 कुंड थे । ब्रज की लोक कथाओं के अनुसार महाभारत के भीषण समर में पूरी सेना के लिए जलपूर्ति इन्ही कुंडो के माध्यम से हुई थी । अथाह पानी के के ये कुंड अब भी अधिकांश रुप से अतिक्रमण के शिकार हो गये हैं । सूरज कुंड राधा कृष्ण के मिलन कर साक्षी है । राधा जी इसी कुंड में स्नान कर सूर्य भगवान की आराधना नित्यप्रति करती थी । ब्रज की लोक कथाओं में यह कुंड राधा कृष्ण के आत्मीय मिलन की कहानी दिखाई देता है । क्योंकि यहां कुछ ऐसे प्राकृतिक बिंदु है जो श्रद्धालुओं का ध्यान इस सत्यता की ओर खींचता है । पंडित अभयराम जी की पत्नी बिंदु इसी गांव के एक सिद्ध बाबा के आश्रम में कीर्तन करने जाया करती थी । बाबा अपने बालपन से ही सिद्ध आश्रम में आकर अपने इष्ट का भजन करते थे । बंगाली साहित्य में एक बड़ा रोचक वर्णन इन सिद्ध बाबा के लिए आता है । बाल विवाह के तुरंत बाद ये घर छोड़कर ब्रज के धाम राधाकुंड को चल दिये थे । कुंजवाटिका गांव राधाकुंड की गोद में ही बसा है । यही एक सिद्ध आश्रम था । बाबा इसी आश्रम में आकर भजन में रम गए थे । जब इनकी बाल वधू को इनके प्रस्थान का पता चला तो वह भी इन्हे खोजती यहॉ आ पहुंची ।

बाबा उस समय गुफा में ध्यान मग्न थे । वधु ने इनसे निवेदन किया कि मैं आपकी आराधना में बाधक बनना नहीं चाहती । केवल एक बार आप मुझे दर्शन दे दे । मैं यहीं से लौट जाऊंगी । बाबा किसी मोह के भय से गुफा के बाहर नहीं आये । तब वधू ने इन्हें श्राप दिया कि तुम कोड़ी हो जाओगे । वह वहाँ से प्रस्थान कर गई । छह महीना बाद बाबा को भयंकर कोढ़ हो गया । एक दिन आर्त स्वर में बाबा ने श्री राधा जी का स्मरण किया । राधा जी प्रगट हुयी । राधा जी ने कहा कि तुम्हारी पत्नी तुमसे कम तपस्विनी नहीं है । आपने पत्नी के साथ-साथ एक नारी जाति को भी अपमानित किया है अतः श्राप का फल तो भोगना ही है । राधा जी ने बाबा को बताया कि तुम 6 महीने इस गांव की 24 घंटे नंगे पैर परिक्रमा करो । रास्ते में जहां सूर्यास्त हो वहां रुक जाना, सुबह फिर परिक्रमा शुरू करो, जो भी प्रसाद ब्रजवासियों की ओर से मिले उसे स्वीकार करें । तो तुम्हारा कोढ़ ठीक हो जायेगा । राधा जी विलीन हो गयी । एक प्रकाश पुंज बाबा में आश्रम को आलोकित कर गया । बाबा ने तुरंत परिक्रमा शुरू कर दी । दोपहर को कड़कड़ाती गर्मी में जख्मी पैरों से गर्म ब्रजमंडल का स्पर्श पाकर वह कोढ़ ठीक हो गया । उसी दिन से बाबा प्रतिदिन बरसाने राधा जी के दर्शन को जाकर उनके प्रति आभार व्यक्त करते थे । एक दिन प्रातः बेला में बाबा बरसाने से अपने आश्रम लौट रहे थे । इधर से बिंदु अपने पति के लिए खाना लेकर खेतों की तरफ जा रही थी । खाना बहुत ही कम था । बिंदु ने बाबा को प्रणाम किया । बाबा ने बिंदु से कुछ मम्रिक शब्द कहे कि आज तु मुझे थोड़ा भोजन करा दे । तेरा जीवन सफल होने का समय आ गया है । बिंदु संकोच में पड़ गई । क्योंकि खाना उनके पति के लिए भी पर्याप्त नहीं था । बाबा ने कहा बेटी संस्कृत न करो । इस डब्बे में बहुत खाना है । बाबा ने डिब्बा खोला तो वह पूड़ी पकवान से भरा था । बिंदु भी कुछ समझ नहीं पाई । बाबा ने थोड़ा खाना को लेकर उसे विदा किया । बिंदु ने यह घटना अपने पति पंडित अभयराम जी को बताई, वे भी सुनकर संतुष्ट दिखाई दिए । इस घटना के पश्चात बिंदु तथा अभयराम जी के घर परिवर्तन होने लगे । मन प्रफुल्लित रहने लगा । तथा कालांतर में बिंदु में एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया । यह बालक घर के लिए कल्याणकारी साबित हुआ अतः इसका नामकरण भी कल्याण के नाम से हुआ । यह घटना संवत 1595 की है । मात्र 15 वर्ष की उम्र में ही कल्याण एक परम तपस्वी बन गये । संवत 1610 में उन्होने तपस्या शुरु की । सूरज भगवान के सामने घंटों बैठकर ये घंटों तक ध्यान मग्न में रहते थे । अगले 5 वर्ष यानी संबंध 1615 में उन्होंने सिद्धि प्राप्त कर श्री दाऊजी बलराम के विग्रह की स्थापना विदर्भवन में की