जमाना मुगल सम्राट अकबर का था । उस समय मुग़ल सल्तनत की प्रतिष्ठा का सूर्य मध्यान में था तभी श्री दाऊजी एवं रेवती जी के श्री विग्रह प्रगट हुए ।

इन देव विग्रहो के प्रागट्य का भी एक रोचक इतिहास है । हम पूर्व में इंगित कर चुके हैं कि भगवदानुरागी परम भक्त गो॰ कल्याण देवाचार्य जी जो कि ब्रह्मर्षि सौभरि जी के वंश परंपरा में महा तपस्वी गो॰ अभय रामजी के वंश परंपरा में थे । जो संवत 1595 जेष्ठ शुक्ल 11 एकादशी को माता सरस्वती के उधर से अवतरित हुए थे । श्री गिरिराज जी की तलहटी में एक तीर्थ है सूर्य कुंड जो कि वर्तमान में भरना खुर्द के नाम से जाना जाता है । सूर्य कुंड पर भगवान सूर्य नारायण का अत्यंत प्राचीन मंदिर है । इसी के घाट पर श्री कल्याण देवाचार्य जी तपस्यालीन रहते थे । एक दिन उनके हृदय में विचार स्फूरित हुआ कि क्यों न श्री जगदीश पुरी की यात्रा की जाए । समय का सुयोग बना और श्री आचार्य प्रवर प्रस्थान कर यात्रा पर चल दिए । श्री मानसी गंगा स्नान कर गिरिराज परिक्रमा की ओर चल कर मथुरा पहुंचे । देवाचार्य कर विश्राम घाट स्नान किया और जगन्नाथ यात्रा को निकल पड़े, चलते-चलते पहुंचे विदुर्भ वन । यहां रात्रि विश्राम किया । किंतु मन ऐसा रमा की यात्रा का संकल्प आगे नहीं चला और यही सघन वट की छाया में तपश्चर्या लीन रह कर तथा यही पूर्ण कुटी बना कर देवार्चन करने लगे ।

यह समय मध्य युग था मुगल साम्राज्य की प्रतिष्ठा का सूर्य मध्यान में आलोकित था सम्राट अकबर ने अपने संपूर्ण कौशल से एक ऐसे साम्राज्य की नीव रखी जो सहस्त्र वर्षों तक सल्तनत मुगलिया की धारा को कायम रखें एक और मुग़ल सल्तनत का सबूत दे तो दूसरी ओर धर्माचार्य एवं संतो के मुद्दे एवं अवतरण का स्वर्ण युग ब्रजमंडल में जगद्गुरु निंबार्काचार्य श्रीमद् वल्लभाचार्य माधव गोड़िया प्रमोद आचार्य चैतन्य महाप्रभु आदि जगद्गुरु के भक्ति का लेखन कार्यक्रम भक्ति की गंगा प्रवाहित की श्री कल्याण देवाचार्य जी

का जीवन में रहकर अपने इष्ट भगवान श्री बलदेव जी का चिंतन भजन करते एक दिन अपने कर्म से निवृत्त को ही रहे थे कि दिव्या हर मुसलमान भगवान संकर्षण बलदेवजी उनके समक्ष प्रकट हुए आचार्य अपने तन मन की सुध को बैठ बिलावल सजल नेत्र से गदगद होकर चरणों में साष्टांग प्रणाम किया कहने को कुछ भी जिन्हें समर्थ नहीं थे श्री प्रभु ने उठाकर ह्रदय से लगा लिया और कहा कि मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं पर मांगो क्या कहते श्री कल्याण देव जी की वाणी में एक ही शब्द निकला कि प्रभु आप नित्य मेरे घर में ही निवास करें विराजे श्री दाऊजी ने कहा तथास्तु और अंतर्ध्यान हो गए संपूर्ण रात्रि वीरा में छटपटाते में बीती जा रही थी की कुछ शर्तों को निंद्रा लगी और स्वप्ना में श्री दाऊजी ने आदेश दिया कि जहां तुम तपस्या करते हो उसी वटवृक्ष के नीचे मेरी प्रतिमाएं भूमि स्थित है उनका प्राकृतिक करो ऐसा करो प्रभु अंतर्ध्यान हो गए

मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा का दिन था प्रातः होते ही ब्रह्म मुहूर्त में भूमि की खुदाई करने लगे और कुछ ही समय में देव विग्रह स्पष्ट स्पष्ट दिखने लगे और दाऊ जी का प्राकट्य हो गया श्री दाऊजी की प्रतिमा के प्राकट्य के बाद समित में ही माता भगवती रेवती जी की भी प्रतिमा का आभास हुआ दोनों ही विग्रह को प्रकट कर ही वही वटवृक्ष के नीचे ही स्थित कर दिया यह दिन मार्ग से पूर्णिमा संभल 168 है किधर एक और रोचक वृत्तांत घटता है कि यहां नित्य श्री गोकुल से श्री महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पुत्र श्री गोकुलनाथ जी महाराज की गाय चराने आती थी उनमें एक श्यामा को जो कि महाराजश्री को अत्यंत प्रिय थी तथा उनकी इच्छा रहती थी कि उसी श्यामा गाय का दूध श्री ठाकुर जी के भोग में आवे श्यामा दूध को स्वस्थ वटवृक्ष के नीचे पुरोहित कर देती थी इसको तो हमको श्री कल्याण देव जी भी देखते थे किंतु महाराज श्री गोकुलनाथ जी को शंका होती थी वाला पर उसी दिन रात्रि को श्री गुसाईं जी को भी स्वप्ना हुआ कि किंतु वाला पर्सन का करते हो वह तो निर्दोष है वहां मेरी प्रतिमा और वह प्रतिदिन सूरत कर देती है ऐसा इंगित किया स्वामीजी ने प्रार्थना में बैठे विदुर भगवन पधारे युगल विद्रोह के दर्शन किए कल्याण देवाचार्य जी ने नमस्कार अभिवादन हुआ और दोनों महापुरुषों ने अपने अपने विचारों का आदान प्रदान किया दोनों धर्माचार्य अत्यंत हर्षित हुए और श्री विग्रह की स्थापना अर्चना पर विचार करने लगे इधर पूर्ण तरह जंगल में परिवेश में दीवार दीवार चीन की व्यवस्था चिंतनीय थी परंतु भगवत इच्छा और आगरा का अनुगमन कर यही निश्चित हुआ कि यही प्रागट्य स्थल पर वटवृक्ष के नीचे श्री कल्याण देव जी की पुण्यतिथि में ही प्रथम प्रतिष्ठा संपादित हो वैदिक गणित से आचार्य संपादन के साथ हे प्रभु का कल्याण देव जी को दिया हुआ वरदान भी फलीभूत हुआ क्योंकि उन्होंने यही प्रार्थना की थी कि प्रभु आप नित्य मेरे घर में ही निवास करें सर्वप्रथम नैवेद्य में खीर भोग धराई गई तो उसी समय में अधिक शताब्दियों के व्यतीत होने के पश्चात निरंतर कीर्तन युवराज वह में प्रभु औरंग आते हैं कहा कि श्री ठाकुर जी का कल्याण देव जी को साक्षात्कार था जो भी समस्या या प्रश्न होता गोस्वामी जी ठाकुर जी की सेवा में निवेदन करते जब प्रतिष्ठा हुई तभी प्रभु ने बहुत प्रसाद की चर्चा हुई तो श्री दाऊजी के निर्देश दिया कि मुझे तो पकवान सामग्री ही प्रिय है आता उसी आदेश अनुसार श्री ठाकुर जी को राज्य में पूरी लड्डू मोहन