समय बीतता गया श्री दाऊजी का वैभव एवं ख्याति बढ़ती चली जा रही थी । श्री गुसाईं जी द्वारा निर्मित मंदिर छोटा पढ़ने लगा और काल भगवान की गति से मंदिर भी जीर्ण होने लगा तो कोई पर भक्तिह्रदया महारानी दर्शनार्थ आयी और उन्होंने सभी व्यवस्था से युक्त एक नवीन देवालय के निर्माण का संकल्प किया किंतु प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया । पुनः मार्ग शीर्ष पूर्णिमा को ही श्री विग्रहो को इस नये भवन में पधराया गया जो अभी भी मौजूद है। जिसका पुनर्नवीनीकरण ब्रम्हार्षि सौभरि वंशावतस श्री हरि शर्मा निवासी पेठ गांव हाल नॉएडा द्वारा अपने पिताश्री रामस्वरूप जी एवं मातृश्री कोकिला देवी की पुण्य स्मृति में संपादित कराया है। यद्यपि इसके कुछ अंश लय हो गए हैं । परंतु गर्भ ग्रह अभी भी सुरक्षित है जिसे "प्राचीन मंदिर" या पुराना मंदिर कह कर संबोधित करते हैं । जो कि प्राकटय स्थल वट वृक्ष स्मारक के बिल्कुल समीप है । आया जमाना मुग़ल सल्तनत के धर्मद्वेषी शहंशाह औरंगजेब का । उनका संकल्प ही था कि हिंदू देवालयों को ध्वस्त किया जाए और वहां मसजिंदों का निर्माण हो । उसका हिंदू द्वेष इतिहास के पन्नों में भरा पड़ा है । मथुरा का केशव देव मंदिर, वृंदावन का गोविंद देव जी का मंदिर जो कि उस समय के श्रेष्ठतम देवस्थान थे । उनकी ख्याति सुनकर उसके उसने मथुरा कूच किया । मथुरा-वृंदावन के श्रेष्ठतम ख्यातिनामा देवालयों को तोड़ता हुआ बलदेव की और बढ़ा । बलदेव जी की ख्याति उस समय समस्त ब्रज मंडल में व्याप्त थी । उसकी मूर्ति भंजनि सेना ने महावन के बाद दाऊजी की और कूच किया । यह व्यवस्था शाहजहाँ के समय तक चली ।

मूर्तिभंजक लाम लश्कर के साथ आगे बढ़ता गया । उनका अत्याचार बढ़ता ही जा रहा था । परन्तु जब पूछा जाता की दाऊजी कितनी दूर है तो सर्वत्र यही कहा जाता कि दो कोस (यानी चार मील) इधर-उधर घूमते दो कोस की गिनती स्थिर रही तो उनके सिपहसालारो ने निश्चित समझा की यह कोई चमत्कारी विग्रह है । फलत: सुबह होते ही अपनी सूचना के अनुसार विद्रुम वन को कूच किया । थोड़े आगे चलते ही उसके पैदल और घुड़सवार सैनिकों के ऊपर भौरो और बर्र- ततैयो के भारी झुण्डों ने आक्रमण कर दिया । इतने तेज प्राकृतिक आक्रमणों से कहते हैं कि उसके अनेकों घोड़ों और सैनिकों की मृत्यु हो गयी। औरंगजेब के एवं सिपहसालार के मन में बलदेव जी के प्रभाव और चमत्कार को स्वीकार किया और उसके फल स्वरूप 5 गांव माफ़ी एवं एक विशाल नक्कारखाना तथा मंदिर के चारों ओर सुरक्षा हेतु चाहर दीवारी और तिवारियों का निर्माण कराया । जो कि अभी भी मौजूद है तथा नक्कार खाने में उसी समय से लेकर अधवधि पर्यन्त प्रतिदिन 5 बार नौवत बजती चली आ रही है । इस भवन को भेंट कर इस नगाड खाने में नगाड़े बजाने वाले मीरासी को भी राज्य कोष से वेतन देने का फरमान जारी किया जो सन 1668 में उसके वजीर सिपहसालार अब्दुलनबी के द्वारा सल्तनत की मौहर के साथ जारी किया गया था। इस का उल्लेखन श्री बलभद्र पंचांग के प्रकाशक श्री गोयनका जी ने सं 2009 में दरियागंज दिल्ली में भी किया है तथा कई अन्य प्राचीन इतिहासकारों ने भी औरंगजेब के वृतांत को उधृत किया है । यह औरंगजेब की हठधर्मिता की पराजय का मूक साक्षी है । इसी नक्कार खाने का जीणोद्धार अभी वर्ष 2015 में भव्यता पूर्वक कराया गया है । औरंगजेब के बाद तो मुग़ल दरबार का क्रमशः परभाव होना शुरू हो गया । इसके बाद जब उसका पौत्र शाह आलम गददी नशीन हुआ तो उसने श्री दाऊजी के मंदिर की प्रतिष्ठा को स्वीकार किया और 2 गांव पूर्व की माफी में जोड़ कर 7 गांव की माफ़ी मंदिर को संवत 1996 फसली में पृथक फरमान जारी किया । इसमें छवरऊ खैड़ारा , शाहपुर, नूरपुर, अरतौनी, बलरामपुर, चौथाई आदि गांव शामिल किये । मौजा रीढ़ा को मंदिर के सेवायत गोस्वामी पंडो ने खरीदा । रीढ़ा ग्राम को गोस्वामी जगन्नाथ जी ने सन 1205 हिजरी में सामलिया जसवंत भागीरथ आदि जो इसके जमींदार थे ख़रीदा । समस्त रीढ़ा का रकवा 143 एकड़ 23 डैसिमल था ।सारी रीढ़ा की आबादी इसी क्षेत्र में है । इसका दाखिल ख़ारिज स्पेशल कमिश्नर, मेरठ ने विटरवे सीटलमेंट कमिश्नर को आदेश कर मंदिर के सेवायतों के नाम सन 1840 में माफ़ी सुरक्षित की । यह फरमानानामा शाहआलम के आदेश से वजीर नजफरवा बहादुर के हस्ताक्षर एवं शाही मौहर के द्वारा जारी हुआ । शाह आलम ने एक प्रथक आदेश अपने हस्ताक्षर से दिनांक चैत्र सुदी 3 संवत 1840 को जारी किया । उसमें उसने उल्लेख किया कि हमारी सल्तनत हमारे कदीम से मुकर्रिर इस माफीनामे के अलावा समस्त महावन तहसील के हर गांव पर 2 रुपया प्रतिगांव अतिरिक्त माल गुजारी वसूल कर साल-दर-साल मंदिर ठाकुर दाऊजी को भेंट की जाती रहेगी । इसके बाद ब्रजमंडल पर सिंधिया राजवंश का शासन आया । ग्वालियर नरेश महाराज माधवराव सिंधिया ने एक पृथक राजाज्ञा पत्र निर्गत कर गोस्वामी कल्याण देवजी के पौत्र गोस्वामी महाराज श्री हंसराज जी एवं गोस्वामी जगन्नाथ जी को मंदिर में रख रखाव के लिए औरंगजेब एवं शाह आलम की जागीरों को यथावत रखते हुए बाल भोग हेतु माखन मिश्री भोग के लिए वार्षिक बंधानो नगाड खाने तथा बलभद्र कुंड की व्यवस्था हेतु वर्षासन जारी कर राजकोष से देने की घोषणा की । यह फरमान भाद्रपद बदी 4 संवत 1845 को जारी किया गया तथा मंदिर की संपूर्ण संपत्तियों के साथ बलभद्र कुंड एवं मंदिर से संलग्न 256 बीघा जमीन का स्वामित्व उपरोक्त गोस्वामी भातद्वय को भेंट किया । महाराज ग्वालियर नरेश की ग्रांट माफी को ब्रिटिशकाल में जब यहा भूमि निवधक एवं रैवेन्यू अधिकारी कैनजौंक इन्होंने उसे बंदोबस्त के समय मंदिर के नाम इन्द्रराज किया और इसे इंपीरियल ग्रांड का नाम दिया । सन 1838 में मथुरा के कलक्टर टेलर ने इससे स्वीकृत कर मंदिर की माफी कहकर संबोधित कर शाही ग्रांट का नाम दिया और उस राशि को नियमित रूप से सेवायत पंडो को देने का आदेश दिया । इस आदेश को जुलफर अली चौधरी, काली मौहर अली हाकिम रेवेन्यू ने अपने हस्ताक्षर से विशेष दर्जा देकर रिकॉर्ड में अंकित किया । अद्यावधि मुगल कालीन माफियों तथा सिंधिया नरेशों की परिसंपत्तियों की माल गुजारी स्वतंत्र भारत में भी शाही ग्रांट या एन्यूटी वसूल कर प्रति वर्ष मंदिर को भारत सरकार के खजाने से निर्गत कर भेट की जाती है । इसके अतिरिक्त अनेको एतिहासिक साक्ष्यों के दस्तावेज अभी भी सुरक्षित है

श्री माधवराव सिंधिया का फरमान 10 अगस्त 1821 कनिघम कलेक्टर के समय इंपीरियल ग्रांट कौनलौक ऑफिसर के हस्ताक्षर से निर्गत हुआ । टैलर कलेक्टर मथुरा में माफी को स्वीकृत कर पुनः चालू किया । 1838 में इस हेतु अंग्रेजी हुकूमत ने मंदिर देवालय माफी को स्वीकृत किया । शाहआलम 1205 हिजरी में पंडो को मंदिर एवं कुंड की मालकियत दी । इस आदेश को महाराज सिंधिया काजी मोहर अली और सैयद जुलफर अली चौधरी ने अपने हस्ताक्षर से परगना महावन के रिकार्ड मै दर्ज किया । सन 1205 हिजरी में ही जगन्नाथ जी ने रीढ़ा ग्राम को समालिया, जसवंत भगीरथ आदि से खरीदा । जिसमें ग्राम की जमीन एव कुंड शामिल थे रकवा 143 एकड़ 23 डेसीमल । इस हेतु दाखिल खारिज होकर सेवायत मंदिर गोस्वामी कमलापति एवम जयराज जी पण्डा के नाम दर्ज हुए । सन 1840 मैं स्पेशल कमिश्नर मेरठ ने विटरवे सेटलमेंट कमिश्नर को आदेश देकर मंदिर सेवायतों की माफ़ सुरक्षित करने के आदेश दिए । सिंघिया शासन के साथ-साथ येह क्षेत्र भरतपुर नरेश के शासन में रहा । महाराज सूरजमल की अनन्य आस्था श्री दाऊजी में थी । इसका प्रमाण भी आप अनुभव कर सकते हैं कि दिल्ली फतह करने के बाद शाही महल का फाटक भरतपुर भेज दिया गया और अत्यंत दुर्लभ पुष्पों का शाही बगीचा खुदवाकर श्री दाऊजी की फूल सेवार्थ बलदेव में लाकर रोपित कर दिया । सन 1845 उसमें जहां से पुष्प एवं पौधे लगाए गए उसे "ठाकुर बाला बाग" के नाम से आज भी जाना जाता है । मंदिर की सुरक्षा एवम बाग की देख भाल के लिए महाराज सूरजमल ने एक रक्षा चौकी बनवायी । जो की आज भी मौजूद है एवं लाल अखाड़े के नाम से अपने अतीत के वैभव की यशोगाथा की साक्षी है । सन 1845 में महाराज सूरजमल की मृत्यु के बाद भी निरंतर भरतपुर राजपरिवार श्री दाऊजी के दर्शन कर सेवा अर्पित करता रहा है । इसके साथ ही समस्त जाट राज परिवारों की कुल देव श्री दाऊजी हैं । सभी जाट रियासतों में राज भवनों, नगरों में श्री दाऊजी के मंदिर प्रतिष्ठित है । चाहे मुरसान हो या हाथरस सासनी या मैडू साथ ही अन्य रियासतों में भी ।